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Cartography Study Notes - मानचित्र का अर्थ एवं परिभाषा – Meaning and Definition of a Map

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मानचित्र का अर्थ एवं परिभाषा – Meaning and Definition of a Map 
मानचित्र किसे कहते हैं – कागज अथवा किसी समतल सतह पर पृथ्वी के सम्पूर्ण अथवा कुछ भाग के धरातलीय एवं सांस्कृतिक लक्षणों को दर्शाना मानचित्र कहलाता है। मानचित्र (Map) लैटिन भाषा के मैप्पा (Mappa) शब्द से लिया गया है। मानचित्र को फोटो चित्र से अलग रखा जाता है। फोटोचित्र में किसी वस्तु अथवा स्थान की वास्तविक आकृति आ जाती है। जब कि मानचित्र में दर्शाए जाने वाले विभिन्न विवरणों को रूढ चिन्हों (stereotypes) के द्वारा दर्शाया जाता है। 
एफ.जे. मॉक हाऊस ( F.J. Monk House):  के मतानुसार: ‘निश्चित मापनी के अनुसार धरातल के किसी भाग के लक्षणों के समतल सतह पर निरूपण को मानचित्र कहते हैं।’ 
स्टैनले व्हाइट ( Stanley White) के अनुसार : मानचित्र वह साधारण चित्र है जिस पर किसी देश अथवा प्रदेश की आकृति को समतल सतह पर चित्रित किया जाता है।
मानचित्रों का उद्देश्य ( Purpose of Maps )
मानचित्र का प्रथम उद्देश्य पथ्वी पर पाए जाने वाली विभिन्न प्राकृतिक एवं मानवीय लक्षणों को मापनी के अनुसार छोटे आकार में परिवर्तित करके उन्हें समझने योग्य बनाना है। क्योंकि हमारी पृथ्वी  इतनी बड़ी है कि इसको एक बार में आँखों से देखना सम्भव नहीं है।
धरातल पर विभिन्न प्रकार की स्थल आकृतियाँ जैसे- पर्वत, पठार, मैदान, झीलें तथा नदियाँ, मिट्टियाँ और जलवायु के साथ-साथ अनेक प्रकार के मानवीय क्रिया कलाप पाए जाते हैं। इन सभी प्रकार के तथ्यों को दर्शाना मानचित्र का उद्देश्य है। यद्यपि इस कार्य के लिए अनेक सांख्यिकीय आरेखों का भी प्रयोग किया जाता है लेकिन वे सब गौण विधियाँ हैं। इन सब को प्रदर्शित करने के लिए मानचित्र ही एक उपयुक्त विधि है।

मानचित्रों की आवश्यकता एवं उपयोग ( Needs and Uses of Maps )
वास्तव में ग्लोब (Globe) ही पथ्वी की आकृति को सही प्रदर्शित करता है लेकिन ग्लोब के अध्ययन में अनेक कठिनाईयाँ आती है जैसे1. आकृति में ग्लोब गोल होने के कारण उस पर दर्शाए गए भिन्न महाद्वीपों एवं महासागरों दोनों को एक ही समय एक नजर में देख पाना सम्भव नहीं हैं जिसके कारण एक आम आदमी पृथ्वी  पर फैले हुए महाद्वीपों एवं महासागरों की सही-सही स्थिति को समझ नहीं पाता जब कि मानचित्र द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी  को एक ही नजर में देखा जा सकता है।
ग्लोब आकृति में बहुत छोटे होने के कारण पथ्वी के किसी क्षेत्र को उन पर विस्तारपूर्वक नहीं दिखाया जा सकता जबकि मानचित्र द्वारा छोटे से छोटे क्षेत्र का विस्तारपूर्वक अध्ययन सम्भव है। 
मानचित्र द्वारा पथ्वी के किन्हीं दो क्षेत्रों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है जबकि ग्लोब द्वारा यह सम्भव नहीं है। 
मानचित्र पर किन्हीं दो स्थानों की दूरी मापना आसान है जबकि यह कार्य ग्लोब पर काफी कठिन है। मानचित्रों का उपयोग मानव के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक क्रियाकलापों को दर्शाने के लिए किया जाता है। मानचित्र के उपयोग को ध्यान में रखते हुए इसे ‘भूगोलवेता का उपकरण’ कहा गया है।
भूगोल के अतिरिक्त मानचित्र का उपयोग – भू-विज्ञान, जलवायु विज्ञान, मौसम विज्ञान, समुद्र विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, खगोल विज्ञान, इतिहास, कृषि आदि विषयों में भी बढ़ रहा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व में मानचित्रों का उपयोग काफी बढ़ा है मानचित्र के उपयोग का हिटलर के इस कथन से भी पता चलता है ‘मुझे किसी भी देश का मानचित्र दो, मैं उस देश पर विजय प्राप्त कर लूँगा।’ मानचित्र के द्वारा कम से कम स्थान पर अधिक से अधिक सूचनाओं को दर्शाया जाता है।
डॉ. एच.आर. मिल (Dr. H.R. Mill) के अनुसार “यह सिद्धान्त मान लिया जाना चाहिए कि भूगोल में जिसका मानचित्र नहीं बनाया जा सकता उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।”

मानचित्र के प्रकार एवं वर्गीकरण ( Classification of Maps ) 
मानचित्रों का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जा सकता है जैसे- मापनी, उद्देश्य, स्थलाकृति लक्षण की मात्रा, अतवस्तु तथा रचना विधि लेकिन प्रमुख रूप से मानचित्रों के वर्गीकरण का प्रमुख आधार, मापनी, एवं उद्देश्य हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है।
मापनी के आधार पर मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps on the basis of Scales ) मापनी के अनुसार मानचित्रों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है।
(i) बड़ी मापनी मानचित्र ( Large Scale maps )
(ii) छोटी मापनी मानचित्र। ( Small scale Maps )
बड़ी एवं छोटी मापनी के आधार पर मानचित्र चार प्रकार के होते हैं। 
(A) भूसम्पति मानचित्र (Cadastral Maps) यह मानचित्र बड़ी मापनी पर बनाए जाते हैं अर्थात किसी छोटे से क्षेत्र का  विस्तृत विवरण इन मानचित्रों में दर्शाया जाता है। जैसे ग्राम मानचित्र, नगर मानचित्र, सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत भूमि क्षेत्र मानचित्र आदि इन्हें सरकारी मानचित्र भी कहते हैं।
क्योंकि सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार की कर वसूली, नगर योजना, ग्रामीण भूमि उपयोग आदि के लिए भूसम्पति मानचित्र बनवाए जाते है। इन मानचित्रों की मापनी 1 सेoमीo : 40 मीटर अथवा 1 इंच : 110 गज से लेकर 1 सेoमीo : 20 मीटर अथवा 1 इंच: 55 गज तक होती है। 
(B) स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Maps) भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अनुसार स्थलाकृतिक मानचित्र वे मानचित्र होते है जिसमें दिखाए गए प्रत्येक लक्षण की स्थिति एवं आकृति को मानचित्र में देखकर उस लक्षण की धरातल के ऊपर पहचान की जा सके। यह मानचित्र भी बड़ी मापनी पर बनाए जाते हैं।इन मानचित्रों के द्वारा उच्चावच (पर्वत, पठार, मैदान), प्रवाह, वनस्पति, ग्राम, नगर, विभिन्न प्रकार के परिवहन मार्गों तथा नहरों आदि को दर्शाया जाता है। किसी छोटे क्षेत्र के  विस्तृत अध्ययन के लिए यह मानचित्र अधिक उपयोगी होते हैं। मीट्रिक प्रणाली आने से पहले इन मानचित्रों को इंच : 1 मील, 1 इंच : 2 मील तथा 1 इंच : 4 मील की मापनी पर बनाया जाता था लेकिन मीट्रिक प्रणाली अपनाने के बाद यह मानचित्र 1:25, 000 तथा 1 : 50, 000 मापनी पर बनाए जाने लगे हैं।
(C) दीवारी मानचित्र (Wall Maps) इन मानचित्रों को भौगोलिक मानचित्र भी कहा जाता है। इनके द्वारा सम्पूर्ण पथ्वी अथवा उसके किसी विस्तृत भाग को दर्शाया जाता है। स्कूल एवं कॉलेज की दीवारों पर लगे मानचित्र भी इसी श्रेणी के अर्न्तगत आते हैं।
इन मानचित्रों द्वारा  विस्तृत भू-भाग के अनेक प्राकृतिक अथवा मानवीय लक्षणों को दर्शाया जा सकता है जैसे- जलवायु, वनों के प्रकार, खनिजों का वितरण, जनसंख्या वितरण, विभिन्न प्रकार की फसलों का वितरण आदि। यह मानचित्र छोटी मापनी पर बनाए जाते हैं। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा यह मानचित्र 1 : 15,000,000 से 1 : 2, 500,000 अथवा 1 सेमी0 : 5 कि.मी. से 1 सेमी0 : 40 किमी. मापनी पर बनाए जाते हैं। 
(D) एटलस मानचित्र (Atlas Maps) इन मानचित्रों के द्वारा महाद्वीपों या प्रदेशों के केवल प्रमुख प्राकृतिक एवं मानवीय लक्षणों को ही दर्शाया जाता है। क्योंकि एटलस मानचित्र भी छोटी मापनी पर बनाए जाते है। इसलिए छोटे लक्षणों को मानचित्र पर दर्शाना सम्भव नहीं हो पाता। एटलस मानचित्र प्रायः 1 : 15,00,000 से छोटी मापनी पर बनाए जाते हैं।
भारत की राष्ट्रीय मानचित्रावली का अंग्रेजी संस्करण 1:1,0,00,000 मापनी पर तैयार किया गया है। एटलस मानचित्र शिक्षण कार्यों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं इन मानचित्रों के द्वारा सम्पूर्ण विश्व, महाद्वीप अथवा किसी देश के विभिन्न भौतिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को एक नजर में देखा जा सकता है।
द्देश्य अथवा विषय वस्तु के आधार पर मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps According to Purpose or Subject Matter) 
उद्देश्य अथवा विषय वस्तु पर आधारित मानचित्रों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। 
(A) प्राकृतिक अथवा भौतिक मानचित्र 
(B) मानवीय अथवा सांस्कृतिक मानचित्र। 


(A) प्राकृतिक अथवा भौतिक मानचित्र (Natural or Physical Maps)
निम्नलिखित मानचित्रों को प्राकृतिक अथवा भौतिक मानचित्रों की श्रेणी में रखा गया है। I 
1 खगोलीय मानचित्र (Astronomical Maps) इन मानचित्रों के द्वारा खगोलीय नक्षत्रों, निहारिकाओं, ग्रहों, तथा उपग्रहों आदि की आकाशीय स्थिति को दर्शाया जाता है। 
II भूवैज्ञानिक मानचित्र (Geological Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी क्षेत्र की संरचना एवं उसकी बाह य आक ति (परिच्छेदिका) को दर्शाया जाता है। 
III भूकम्पी मानचित्र (Seismic Maps) इस मानचित्र के द्वारा भूकम्पीय केन्द्र, भूकम्पीय तरंगों तथा उनके फैलाव को दर्शाया जाता है। 
IV उच्चावच मानचित्र (Relief Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण प थ्वी अथवा उसके किसी भाग की बनावट तथा उस पर पाई जाने वाली विभिन्न स्थलाक तियों को दर्शाया जाता है जैसे- पर्वत, पठार, मैदान, नदियाँ, घाटियाँ आदि। 
V जलवायु एवं मौसम मानचित्र (Climatic and Weather Maps) इन मानचित्रों के द्वारा जलवायु एवं मौसम सम्बन्धी विभिन्न तत्वों को दर्शाया जाता हैं जैसे- तापमान, वर्षा, वायुदाब, पवनों की दिशा आदि का विवरण।
VI अपवाह मानचित्र (Drainage Maps) इन मानचित्रों के द्वारा प्रमुख नदी एवं उसकी सहायक नदियों के प्रवाह एवं उसकी दिशा को दर्शाया जाता है। 
VII मदा मानचित्र (Soil Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी प्रदेश में पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की मिट्टियों को दर्शाया जाता है। 
VIII वनस्पति मानचित्र (Vegetation Maps)
इन मानचित्रों के द्वारा किसी प्रदेश में पाई जाने वाली विभिन्न प्राकतिक वनस्पतियों के वितरण को दर्शाया जाता है।
(B) मानवीय अथवा सांस्कृतिक मानचित्र (Human or Cultural Maps) 
निम्नलिखित मानचित्रों को मानवीय अथवा सांस्कृतिक मानचित्रों की श्रेणी में रखा जाता है।
I समाज-सांस्कतिक मानचित्र (Socio-Cultural Maps) इन मानचित्रों द्वारा मानव संस्क ति से जुड़े हुए घटकों को दर्शाया जाता है जैसे- जाति, भाषा, धर्म, वेशभूषा आदि। 
II जनसंख्या मानचित्र (Population Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण विश्व, किसी देश अथवा राज्य की जनसंख्या का वितरण, धनत्व, व द्धि, स्त्री-पुरुष अनुपात, आयु-वर्ग, स्थानान्तरण तथा व्यावसायिक संरचना आदि को दर्शाया जाता है। 
III आर्थिक मानचित्र (Economic Maps) इन मानचित्रों द्वारा मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को दर्शाया जाता है। जैसेक षि मानचित्र में विभिन्न फसलों के वितरण को दर्शाया जाता है। औद्योगिक मानचित्र में विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों को दर्शाया जाता है। परिवहन मानचित्र में किसी क्षेत्र के विभिन्न प्रकार के परिवहन मार्गों को दर्शाया जाता है। खनिज मानचित्र में किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले खनिजों का वितरण दर्शाया जाता है।
IV राजनैतिक मानचित्र (Political Maps) इन मानचित्रों द्वारा सम्पूर्ण विश्व, किसी देश, राज्य अथवा जिले आदि की राजनैतिक सीमाओं को दर्शाया जाता है।
V ऐतिहासिक मानचित्र (Historical Maps) इन मानचित्रों द्वारा किसी देश के राजनैतिक इतिहास तथा इससे सम्बन्धित घटानाओं को दर्शाया जाता है।







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